Friday, 20 June 2014

धारा ३७० के सम्बन्ध में कुछ लक्षणीय हकीकती बिन्दू


१) धारा ३७० अपने भारत के संविधान का अंग है| 
२) यह धारा संविधान के XXI वे भाग में समाविष्ट हैइस भाग का शीर्षक है- अस्थायी,परिवर्तनीय और विशेष प्रावधान’ (Temporary, Transitional and Special Provisions). 
३) धारा ३७० के शीर्षक के शब्द हैं - जम्मू-कश्मीर के सम्बन्ध में अस्थायी  प्रावधान’ (“Temporary provisions with respect to the State of Jammu and Kashmir”). 
४) अपना संविधान २६ जनवरी १९५० से अमल में आयाधारा ३७० के तहत जो प्रावधान है उनमें समय समय पर परिवर्तन किया गया हैइस धारा का क्षरण १९५४ से प्रारम्भ हुआ१९५४ का महत्त्व इस लिये है कि १९५३ में उस समय के कश्मीर के वजीर-ए-आजम शेख महम्मद अब्दुल्लाजो कि अपने प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहरलाल नेहरू के अंतरंग मित्र थेको गिरफ्तार कर बंदी बनाया थाये सारे संशोधन जम्मू-कश्मीर के विधानसभा द्वारा पारित किये गये हैं| 
५) संशोधित किये हुये प्रावधान इस प्रकार के हैं- 
अ) १९५४ में चुंगीकेंद्रीय अबकारीनागरी उड्डयन और डाकतार विभागों के कानून और नियम जम्मू-कश्मीर को लागू किये गये|
आ) १९५८ से केन्द्रीय सेवा के आयएएस तथा आयपीएस अधिकारियों की नियुक्तियॉं इस राज्य में होने लगीइसी के साथ सीएजी (CAG) के अधिकार भी इस राज्य पर लागू हुये|
इ) १९५९ में भारतीय जनगणना का कानून जम्मू-कश्मीर पर लागू हुआ|
र्ई) १९६० में सर्वोच्च न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के निर्णयों के विरुद्ध अपीलों को स्वीकार करना शुरू कियाउसे अधिकृत किया गया|
उ) १९६४ में संविधान के अनुच्छेद ३५६ तथा ३५७ इस राज्य पर लागू किये गयेइस अनुच्छेदों के अनुसार जम्मू-कश्मीर में संवैधानिक व्यवस्था के गडबडा जाने पर राष्ट्रपति का शासन लागू  करने के अधिकार प्राप्त हुए|
ऊ) १९६५ से श्रमिक कल्याणश्रमिक संगठनसामाजिक सुरक्षा तथा सामाजिक बीमा सम्बन्धी केन्द्रीय कानून राज्य पर लागू हुए|
ए) १९६६ में लोकसभा में प्रत्यक्ष मतदान द्वारा निर्वाचित अपना प्रतिनिधि भेजने का अधिकार दिया गया|
ऐ) १९६६ में ही जम्मू-कश्मीर की विधानसभा ने अपने संविधान में आवश्यक सुधार करते हुए- प्रधानमन्त्री’ के स्थान पर मुख्यमन्त्री’ तथा सदर-ए-रियासत’ के स्थान परराज्यपाल’ इन पदनामों को स्वीकृत कर उन नामों का प्रयोग करने की स्वीकृति दी| ‘सदर-ए-रियासत’- अभी का राज्यपाल- का चुनाव विधानसभा द्वारा हुआ करता थाअब राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होने लगी| 
ओ) १९६८ में जम्मू-कश्मीर के उच्च न्यायालय ने चुनाव सम्बन्धी मामलों पर अपील सुनने का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को दिया|
औ) १९७१ में भारतीय संविधान के अनुच्छेद २२६ के तहत विशिष्ट प्रकार के मामलों की सुनवाई करने का अधिकार उच्च न्यायालय को दिया गया|
क) १९८६ में भारतीय संविधान के अनुच्छेद २४९ के प्रावधान जम्मू-कश्मीर पर लागू हुए| 
यह सच है कि बीते हुये २८ वर्षों में धारा ३७० का क्षरण नहीं हुआकिन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वह हमेशा के लिये स्थित हो गई हैपं. जवाहरलाल नेहरू ने जम्मू-कश्मीर के एक नेता पं. प्रेमनाथ बजाज को २१ अगस्त १९६२ में लिखे हुये पत्र से यह स्पष्ट होता है कि उनकी कल्पना में भी कभी ना कभी धारा ३७० समाप्त होगीपं. नेहरू ने अपने पत्र में लिखा है- ‘‘वास्तविकता तो यह है कि संविधान का यह अनुच्छेदजो जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा दिलाने के लिये कारणीभूत बताया जाता हैउसके होते हुये भी कई अन्य बातें की गयी हैं और जो कुछ और किया जाना हैवह भी किया जायेगामुख्य सवाल तो भावना का हैउसमें दूसरी और कोई बात नहीं हैकभी-कभी भावना ही बडी महत्त्वपूर्ण सिद्ध होती है|’’ 
और कुछ बिन्दू ध्यान में लेने लायक है| 
१) इस धारा में ही उसके सम्पूर्ण समाप्ति की व्यवस्था बताई गयी हैधारा ३७० का उप अनुच्छेद ३ बताता है कि ‘‘पूर्ववर्ती प्रावधानों में कुछ भी लिखा हो राष्ट्रपति प्रकट सूचना द्वारा यह घोषित कर सकते है कि यह धारा कुछ अपवादों या संशोधनों को छोड दिया जाये तो समाप्त की जा सकती है| 
इस धारा को एक परन्तुक (Proviso) भी हैवह कहता है कि इस के लिये राज्य की संविधान सभा की मान्यता चाहियेकिन्तु अब राज्य की संविधान सभा ही अस्तित्व में नहीं हैजो व्यवस्था अस्तित्व में नहीं है वह कारगर कैसे हो सकती हैयह भी ध्यान में लेना आवश्यक है कि धारा ३७० ही अस्थायी हैउसे चिरस्थायी नहीं बनाना चाहिये| 
हम यह मानते हैं कि धारा ३७० यह कश्मीर घाटी के लोगों के लिये भावना का विषय बनी हैकिन्तु जम्मू-कश्मीर राज्य के और भी दो भाग है१) जम्मू प्रदेश और २) लद्दाख|जम्मू और लद्दाख की जनता की भावना का भी आदर करना आवश्यक है| 
यह स्पष्ट है कि यह दो क्षेत्र धारा ३७० को नहीं चाहतेतो आवश्यक हो जाता है कि जम्मू-कश्मीर राज्य का त्रिभाजन होमतलब यह है कि जम्मू का अलग राज्य हो और लद्दाख को केंद्र शासित प्रशासन का दर्जा प्राप्त होयह भी ध्यान में लेना आवश्यक है कि जम्मू प्रदेश की जनसंख्या कश्मीर घाटी की जनसंख्या के बराबर हैउसका क्षेत्र तो घाटी के क्षेत्र से ११ हजार वर्ग कि. मी. अधिक हैजम्मू प्रदेश की तथा घाटी की जनसंख्या उत्तर-पूर्व के अनेक राज्यों की जनसंख्या से अधिक हैअत: आज के जम्मू-कश्मीर राज्य के तीन हिस्से बनने में कोई अनौचित्य नहीं हैफिर घाटी की जनता ३७० के अस्तित्व का आनंद ले सकती है| 
मैं यह समझता हूँ कि इस सारी प्रक्रिया को पूर्ण करने में लम्बा समय लगेगाकिन्तु राज्य विधानसभा में तुरन्त कम से कम तीन कानून पारित करने चाहियेऔर वह भी इस राज्य विधानसभा के चुनाव के पहले| 
१) जम्मू प्रदेश में करीब ३ लाख लोग ऐसे हैं जो लोकसभा के लिये चुनाव में मतदान तो कर सकते है किन्तु राज्य विधानसभा के लिये मतदान नहीं कर सकतेमतलब है कि वे भारत के नागरिक है लेकिन जम्मू-कश्मीर राज्य के नागरिक नहीं हैयह छलावा तुरन्त समाप्त होना चाहिये| 
२) कश्मीर के निर्वासित पण्डितों का पुनर्वसन होघाटी के बहुसंख्य मुस्लिमों को इस की शरम आनी चाहिये कि कश्मिरी पण्डित अपने परम्परागत मकानों में सुरक्षित और इज्जत के साथ नहीं रह सकेपण्डितों के साथ उनके पुनर्वसन के सम्बन्ध में तुरन्त बातचीत शुरू होनी चाहिये| 
३) अन्य राज्य के समान जम्मू-कश्मीर विधानसभा का कार्यकाल भी पांच वर्ष का होजो अभी छ: वर्षों का हैजिसका कोई औचित्य और प्रयोजन नहीं है| 
मैं आशा करता हूँ कि नई केन्द्र सरकार इस सम्बन्ध में यथा शीघ्र कदम उठाएगी|

-मा. गो. वैद्य
10 जून 2014

Wednesday, 4 June 2014

Some Salient facts about Article 370

1. Article 370 is a part of our Constitution.
2. It is included in part XXI, the title of which is "Temporary, Transitional and Special Provisions".
3. The heading of Article 370 is worded as "Temporary provisions with respect to the State of Jammu and Kashmir".
4. Our Constitution came into effect from 26th January 1950. The special provisions envisaged by Article 370, have been amended from time to time. The erosion has started from 1954. 1954 is important because in 1953, Shaikh Mohmed Abdullah, a very close friend of our first Prime Minister Pt. Jawaharlal Nehru was arrested and put behind bars. Of course all these amendments were endorsed by the J&K State assembly.
5. The following changes were made by these provisions:

(a) In 1954, the laws and rules of departments of Customs, Central Excise, Civil Aviation and Post & Telegraph were made applicable to the State.
(b) In 1958, the Centre could appoint IAS and IPS officers in the State. So also the State came under the authority of the CAG.
(c) In 1959, the Central Census law was applied.
(d) In 1960, the Supreme Court got the appellate power to review the judgments of the J&K High Court.
(e) In 1964, Articles 356 and 357 were made applicable to the State. We all know that the Article 356 empowers the President, in case of Constitutional breakdown in the State, to assume all or any of the functions of the Government. It means that the Presidential rule will be there. And Article 357 gives to the President's nominee i.e. the Governor to exercise the powers of the State Legislature also.
(f) From 1965 all the Central laws pertaining to labour unions, Social Security, Insurance etc were made applicable to the State.
(g) In 1966, the people of the State got the right to send their elected representatives to the Lok Sabha.
(h) In 1966 itself the State Assembly made an amendment in the Constitution of the State by which, the titles of Vazir-e-Azam and Sadar-e-Riyasat were changed to the Chief Minister and the Governor as in other States.
(i) In 1969, in cases related to the election, the Supreme Court got the appellate authority over the decisions of the State High Court.
(j) In 1971, the State High Court got the powers conferred by Article 226 of our Constitution which enables it to hear the writs in the nature of habeas corpus, mandamus, prohibition, quo warranto, certiorari or any of them, for the enforcement of any of the rights conferred by Part III.
(k) From 1986, Article 249 was made applicable to the State. This Article gives power to the Indian Parliament 'to legislate with respect to a matter in the State List in the national interest'.

It is true that since last about 28 years no erosion of the Article 370 was effected. We can infer from a letter that Pt. Jawaharlal Nehru wrote to Pt. Premnath Bajaj, an important personality in J&K, on 21st August 1962, that Panditji was in favour of completely abrogating the Article. The letter purports to say that in spite of the Article that gives special status to J&K, much has been effected; and even that which remains to be done will be done. In this matter the main problem is of sentiments.

Some other facts are also to be noted:

The article itself contains the provision to completely annul the Article. Sub section 3 of the Article 370 says- "Notwithstanding anything in the forgoing provisions of this article, the President may, by public notification, declare that this article shall cease to be operative only with such exceptions and modifications from such date as he may specify."

It is true that there is a proviso viz. "the recommendation of the Constituent Assembly of the State referred to in clause (2) shall be necessary before the President issues such a notification." But is the Constituent Assembly of the State in existence? How can a dead institution give its approval? Besides Article 370 is a temporary provision and therefore should not be made a permanent feature.

It is to be admitted that Article 370 has became a sentimental issue, for the leaders of the Kashmir Valley. But the State consists of other two regions also viz. a) Jammu and b) Laddakh. The sentiments of the people of these two regions should also be respected.

These two regions don't want the Article 370. So let the State be trifurcated into three units viz. (1) Jammu, a separate state and (2) Laddakh getting a union territory status and (3) Valley The population of the Jammu region is almost equal to that of the valley. The area of Jammu is more than that of the valley by 11000 sq. kms. The population of this new State of Jammu will be more than that of any of the six states of the North-east. Let the State assembly pass a resolution to this effect, and let the valley satisfy itself with Article 370 as it stands today.

I can realize, that this involves a long process. But let the State Assembly pass at least the 3 laws at the earliest, I mean before the State Assembly elections.

1) More than 2 lac people of Jammu region have a right to vote for the Lok Sabha, but not for the State Assembly. It means that they are citizens of India but not of the J&K. This absurdity must be immediately removed.

2) Immediate efforts be made to rehabitate the Kashmiri Pandits. It is a shame on all people of the valley and they must hang their head in disgrace that the Pandits were not allowed to live in their ancestral houses by the majority, I mean Muslims. Immediate dialogue be started with the Pandits.

3) The tenure of the State Assembly be reduced to five years like all the States of the Union. What is the point in having a tenure of six years for one State only?

I hope the new Central Government will move with alacrity in this matter.

-M G Vaidya

Tuesday, 20 May 2014

HISTORICAL VICTORY FOR BJP AND FUTURE OF THE CONGRESS


The results of elections for the 16th Parliament are out. The BJP has scored an outstanding victory. The BJP led by Shri Atal Bihariji had won 182 seats in the 1998 and 1999 elections. Additional 90 seats required to form a stable Government were managed with support from friendly parties which were as diverse as the Shiv Sena from Maharashtra and the National Conference of J&K. The BJP had its own independent manifesto for the 1998 elections but had to work out a ‘Common Minimum Program (CMP)’ with some friendly parties to form a Government. The Government fell after only 13 months due to uncooperative attitude of one supporting party and necessitated fresh elections in 1999. The BJP fought the elections with the CMP (worked out earlier) as its manifesto with its partners but could not increase its tally beyond 182 seats. However, with the support from friendly parties, Atal Bihari Bajpayeeji ran an effective stable Government for the next 5 years.

INCOMPARABLE VICTORY
This time the BJP has secured 284 seats on its own, 12 more than necessary to form a stable Government – this is indeed an outstanding historic achievement. The distinctive feature has been that the BJP fought these elections on its own independent manifesto. It included the issues of Ram Mandir at Ayodhya, Common Civil Code and Article 370 which had to be left out of the 1999 manifesto (CMP) earlier. Apart from BJP allies the Akali Dal and the Shiv Sena, Paswan’s Lok Janshakti Party, Chandrababu Naidu led TDP and some other parties in the south were also part of the NDA. Development and Transparency in Governance were the core issues in these elections – there can be no two opinions about their importance. And though everyone may not agree with the above mentioned three issues included in the BJP manifesto, the very fact that these other parties joined the NDA umbrella indicates that they are not likely to have direct opposition if steps are taken to resolve these concerns within the constitutional and judicial framework.. The BJP led NDA has secured 334 seats, more than 60%, a record breaking triumph, which no other Party or Group can boast of over the last seven elections – almost 30 years, since Rajiv Gandhi won in 1984.

MODI’S ACCOMPLISHMENT
The credit for this exceptional and glorious success of BJP, beyond doubt, goes to Shri Narendrabhai Modi. His relentless hard work, untiring efforts in establishing communication with people – addressing their aspirations and concerns specially his direct connect with the younger generation, has resulted in superb victory for the BJP. This is not to downplay the role of the party organisation or its workers. These existed in 2004 and 2009 too. But the party had suffered reverses nevertheless. That leadership of Narendrabhai Modi infused new life into the party and enthused unbound fresh energy into the workers is now accepted by all.

CONTRIBUTION OF SANGH SWAYAMSEWAKS
The contribution of RSS to this victory also needs to be recognized. The RSS remains away from politics as a rule and is an organisation committed to the good of the entire Society. Politics is one sphere of the social life, but not the only one. Therefore, RSS also has its views on various issues in politics also. In other areas of social life like, education, health & hygiene, religion, industry, agriculture etc, the RSS swayamsewaks also work. Shri Mohanji Bhagwat, Sarsanghchalak, had exhorted all workers and citizens in his Vijaya Dashmi address last October to exercise their right to vote and ensure 100% voting in elections. In follow up the RSS swayamsevaks visited millions of homes creating awareness, motivating and urging people to come out for voting. They did not have to influence the people to vote for someone particular. The people know RSS very well and have faith in its work. These efforts proved very fruitful resulting in extraordinary voting percentages which recorded an exceptional growth [beyond 66%] in these 2014 elections. The swayamsevaks were also driven by the anti “RSS” propaganda let loose by the non-NDA parties, especially the Congress, who propagated that their fight is with the RSS and not with the BJP. Their misguided attempts were always aimed at capturing the Muslim vote en-masse by spreading the imagined fear of RSS amongst them. Therefore, the spiteful role and contribution of such anti BJP parties and the Congress in badmouthing RSS should also not be discounted in this eye-catching success achieved by the BJP.

DEFEAT OF CASTEIST POLITICS
Another distinctive feature of these elections has been the defeat of casteist politics. Hindu society is the majority community in our nation. “People are the Nation” is a universally accepted concept. Similarities in cultural and social values, customs and more importantly “roots” of the people are the true benchmarks for defining the homogeneousness, unity and nationality of a people. Therefore we consider ‘Hindu’ a Nation – a ‘Rashtra’. The Hindu society is made up of many castes, sub-castes, creeds etc having many common features among their practices and beliefs with their distinctive lifestyles. However many narrow minded politicians and groups with lofty sounding names have been trying to achieve ungainly power through dubious means. They actively engage in magnifying the differences and inciting injudicious feelings of injustice. This results in creating wedges and spread hatred amongst the people rather than strengthening the common features that bind the society. These elections have been a resounding slap in the face of such casteist political parties and leaders which they will remember a lifetime. Mayawati’s BSP, a front runner in politics of the Dalits, had won 20 seats in UP alone during the 2009 elections. In this election BSP has been totally wiped out, whereas the BJP has won all the 17 seats reserved in Scheduled Caste category, in U.P. The Samajwadi Party of Shri Mulayam Singh Yadav, which had won maximum parliamentary seats in UP in 2009 has been restricted to just five seats [Mulayam & family members only] out of 80 this time. The SP had not only won the assembly elections in 2009 with a vast majority but is also in power in UP today The voters of UP have totally rejected politicians engaged in castereligion based politics as also the politics of equation of votebanks like “Muslim-Dalit” or ‘Yadav-Muslim’ etc. The outstanding success achieved by the BJP in winning 71 out of 80 seats in UP the credit goes to Amit Shah who has worked himself into the hearts of people making UP almost his home.

CONGRESS DECIMATED
The Congress party has been thoroughly decimated in these elections. A party boasting a tradition of 125 years, which had won 206 seats on its own in the previous election 5 years back, could not even secure 50 seats – it got just 46. What could be more shameful that it has been completely wiped out in 12 states – J&K, HIMACHAL PRADESH, UTTARAKHAND, RAJASTHAN, DELHI, GUJARAT, GOA, TAMILNADU, ODISHA, JHARKHAND and TRIPURA. In fact, in some of these states the Congress is the ruling party. There could have been no greater disgrace for the party than this shocking debacle.

WORRYING THOUGHTS
In my opinion this is matter of great concern and worry. Not only for the Congress party, but also in terms of the democratic system we follow. There are a large number of smaller parties. But they are restricted more or less to a region or a state or two. Trinamool Congress in West Bengal, BJD in Odisha, JD(S) in Karnataka, Shiv Sena in Maharashtra, SP/BSP in UP, AIDMK/DMK in Tamilnadu, Akalis in Punjab etc. They have neither the all India national presence or nor views, reach and policies towards external affairs or defence in entirety. If at all, the TNC views would be limited to Bangla Desh, DMK/AIDMKs to Sri Lanka. CPM has a much larger presence, in three states, with an independent take on external/foreign affairs and economic agenda. However its total dependance on already failed outdated Marxist philosophy would find fewer and fewer takers as we move ahead in time. That leaves us with just the two parties, the BJP and the CONGRESS, that not only have a holistic view of national situation and clear policies towards all issues but more or less also have a historical geographical presence and spread across the country. It is extremely necessary for a healthy democratic system that two parties, more or less equally balanced, are at the core. The USA has the Democrats and the Republicans, UK has the Labour Party and the Conservatives. Power keeps changing hands between such two parties over years and allows healthy democracy to grow. That is why we also need such two healthy competitors and for that the Congress has to wake up, take stock and revive itself.

REVIVING THE CONGRESS
The Congress party is presently fully dependent on the Gandhi Family, Sonia – Rahul – Priyanka Vadra and has no other leaders willing to stand up and be counted. This will not help in its revival. The younger generation is fed up and set against family fiefdoms in politics. What, if any, are the political achievements of either Sonia or Rahul that show up their leadership or acumen? Nothing, Other than being the daughter-in-law of Indira Gandhi and wife of Rajiv Gandhi what does she have to her credit? After spending ten years in Parliament has she ever spoken effectively on any important issue? Same is the case with Rahul. It is time to put aside claims of over-sixty generation and the likes of Digvijay, Chidambaram, Antony, Gehlot etc and give charge in the hands of Jyotiraditya Scindia, Sachin Pilot, Ajay Maken, Dipendra Huda, Milind Deora, Rajendra Mulak, Mukul Wasnik, Meenakshi Natarajan etc. Even Rahul and Priyanka could be part of such new formation. They should chalk out a complete plan for revival and form organizational policies anew, taking care that meaning of secularism is not limited to being “anti-Hindu” and pro-others. Appeasement of none and progress to all should become the core factors of revival. Approach should be towards positivity, climbing above the politics of caste, creed, religion etc and move towards redefining the fundamental philosophy of the party.

Of course there is no fault in treating elder leaders with due respect, recognizing their contributions and giving them due honour, but the leadership should remain now with the young generation. Now is the time for the younger lot to come together and do some brainstorming in the right direction – I feel that is the only way forward for the Congress.

M G VAIDYA
NAGPUR

18 MAY 2014

Monday, 19 May 2014

भाजपा की अभूतपूर्व जीत और काँग्रेस का भवितव्य




16 वी लोकसभा के लिए हुए चुनाव के परिणाम घोषित हुए| भाजपा की अभूतपूर्व जीत हुई| अटलबिहारी बाजपेयी जी के नेतृत्व में हुए 1998 और 1999 के लोकसभा के चुनाव में भाजपा को 182 सिटें मिली थी| स्थिर सरकार स्थापन करने के लिए और 90 सिटों की आवश्यकता थी जो उसके मित्रदलों ने पूर्ण की थी| इन मित्रदलों में महाराष्ट्र में शिवसेना और जम्मू-कश्मीर की नॅशनल कॉन्फरन्स जैसै दो छोर के दलों का समावेश था| 1998 में जब भाजपा चुनाव में उतरी, तब उसका अपना अलग घोषणापत्र था| लेकिन सरकार बनाते समय, अन्य कुछ दलों को साथ लेने के लिए सॉझा कार्यक्रमबनाना पड़ा| एक सहयोगी दल के असहयोग के कारण, वह सरकार 13 माह में ही गिर गई और 1999 में फिर चुनाव हुए| उस 1999 के चुनाव में, एक वर्ष पूर्व जो सॉझा कार्यक्रममान्य हुआ था, वही भाजपा का घोषणापत्र बना और सब दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा| लेकिन भाजपा के सांसदों की संख्या 182 का आँकड़ा पार नहीं कर पाई| मित्रदलों के सहयोग से अटलबिहारी बाजपेयी जी के नेतृत्व में वह सरकार अपना पाँच वर्ष का कार्यकाल पूर्ण  पाई| 



विक्रमी जीत 

अब की बार भाजपा ने अपने बल पर 284 सिटें जीती है| यह पूर्ण बहुमत के लिए आवश्यक सिटों से बारह अधिक है| यह अभूतपूर्व जीत है| इसकी और एक विशेषता यह है कि, भाजपा का अपना स्वतंत्र घोषणापत्र था| 1999 के घोषणापत्र में परे रखे- अयोध्या में का राम-मंदिर, धारा 370, समान नागरी कानून यह विषय, इस घोषणापत्र में समाविष्ट थे| और इन तीन मुद्दों के साथ चुनाव में उतरी भाजपा के साथ शिवसेना और अकाली दल के साथ, पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी, चंद्राबाबू नायडू की तेलगू देसम् पार्टी तथा दक्षिण भारत की अन्य कुछ पार्टियाँ भी थी| विकास और पारदर्शी प्रशासन यह मुद्दें तो थे ही| उनके बारे में किसी का भी अलग मत रहने का कारण नहीं| उपरोक्त उल्लेखित मुद्दों के संदर्भ में सब का एकमत नहीं भी होगा, तथापि, जब इन मुद्दों के साथ चुनाव के संग्राम में उतरी भाजपा के साथ अन्य दलों ने भी गठबंधन किया, तो इसका अर्थ यह है कि, इन तीन मुद्दों के संदर्भ में कानून या संविधान की मर्यादा लांघे बिना भाजपा ने कोई कदम उठाये, तो इन मित्रदलों का विरोध रहने का कारण नहीं| भाजपा की अगुवाई में इस गठबंधन मतलब राष्ट्रीय जनतांत्रिक मोर्चा - एनडीए को - 334 सिटें मिली है| मतलब 61 प्रतिशत से अधिक सिटें मिली है| यह भी, राजीव गांधी के नेतृत्व में काँग्रेस पार्टी को 1984 में मिली सिटों का अपवाद छोड दे, तो गत 25 वर्षों में का एक रेकॉर्ड ही है|


मोदी का श्रेय

भाजपा को मिली इस अभूतपूर्व जीत का श्रेय किसी एक व्यक्ति को देना चाहे तो वह श्री नरेन्द्रभाई मोदी को ही देना पडेगा| उनके अथक प्रयास और जनता तथा उसमें भी युवा पिढी के साथ उन्होंने बनाया संवाद और उसके साथ उनके जुड़े मानसिक एवं वैचारिक तार के कारण ही यह अत्यंत प्रशंसनीय सफलता भाजपा को मिल पाई| इसका अर्थ पार्टी संगठन को कम आँकना कतई नहीं है| किन्तु यह संगठन तो 2004 और 2009 में भी था! लेकिन उस समय पार्टी को हार का मुँह देखना पड़ा था| श्री मोदी के नेतृत्व ने पार्टी में नई जान डाली और नया जोश भर दिया, यह सर्वमान्य है| 


संघ स्वयंसेवकों का योगदान 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का योगदान भी मान्य करना ही पडेगा| संघ राजनीति से अलिप्त रहता है| उसका जुडाव संपूर्ण समाजजीवन के साथ है| राजनीति भी संपूर्ण जीवन का एक घटक है| महत्त्व का घटक है| लेकिन एकमात्र घटक नहीं| इस कारण संघ का इस ओर भी ध्यान रहता है| धर्म, शिक्षा, उद्योग, कृषि आदि क्षेत्रों के समान इस क्षेत्र में भी संघ के कार्यकर्ता है| इस समय, लोकसभा का चुनाव घोषित होने के बहुत समय पूर्व, गत वर्ष के अक्टूबर माह में सरसंघचालक श्री मोहन जी भागवत ने विजयादशमी महोत्सव में किये उद्बोधन में सब मतदान करें और शतप्रतिशत मतदान हो ऐसा विचार रखा था| उस विचारानुरूप संघ के स्वयंसेवक घर-घर गये और लोगों से मतदान करने का आग्रह किया| मतदान किसे करना है यह उन्हें बताना ही नहीं पडा| नागरिकों के विवेक पर संघ का विश्‍वास है| संघ के इस प्रयास के कारण ही मतदान के प्रतिशत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई| संपूर्ण देश में पहली बार 66 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया है| भाजपाविरोधी पार्टियों और मुख्यत: काँग्रेस के संघविरोधी प्रचार ने, स्वयंसेवकों के प्रयासों को और गति, जिद दी| काँग्रेस तो ऐसे प्रचार कर रही थी कि मानों उनकी लडाई भाजपा से न होकर संघ के साथ ही है! संघ का भय दिखाकर मुसलमानों के इकठ्ठा मत हासिल करने की वह एक चाल थी| भाजपा के इस अभूतपूर्व विजय में भाजपाविरोधी पार्टियों के इस संघविरोध का भी बहुत बडा योगदान है|

जातीय राजनीति का पराभव

इस चुनाव की और एक विशेषता यह है कि मतदाता जाति, पंथ, भाषा आदि भेदों से उपर उठ गए| हिंदू यहाँ का बहुसंख्य समाज है| राष्ट्रमतलब लोग होते है -  People are the Nation यह जगत्मान्य सिद्धांत होने के कारण तथा समाज के जीवनमूल्य ही समाज के एकत्व एवं राष्ट्रीयत्व की कसौटी होने के कारण हम हिंदूयह एक राष्ट्र है, ऐसा मानते है| यह हिंदू समाज अनेक जातियों और उपजातियों में विभाजित है| यह विभक्तीकरण कम कर सबको जोडने के बदले, अनेक संकुचित विचारों के स्वार्थी सियासी लोग जाति के आधार पर अपने सत्ताप्राप्ती का जुगाड रचते है| उनकी पार्टियों के नाम दिखाने के लिए बहुत ही अच्छे होने पर भी, उनकी कृति जाति के - जो अब कालबाह्य हो चुकी है - अभिमान को बढावा देनेवाली रही है| इन जातिविशिष्ट पार्टियों को इस चुनाव में मतदाताओं ने सारी जिंदगी याद रहनेवाला करारा चाटा मारा है| दलितों की राजनीति करनेवाली मायावती के बहुजन समाज पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली है| 2009 के चुनाव में इस पार्टी ने केवल उत्तर प्रदेश में 20 सिटें हासिल की थी| इस बार उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सभी 17 सिटें भारतीय जनता पार्टी के खाते में गई है| समाजवादी पार्टी को 2009 में सबसे अधिक सफलता मिली थी| और उसके बाद दो वर्ष पूर्व हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में उसे पूर्ण बहुमत मिला था, वहाँ उस पार्टी की ही सरकार है| फिर भी अब की बार वह केवल पाँच सिटों पर ही सिमट गई| यह पाँचों सिटें, समाजवादी पार्टी के सर्वेसर्वा श्री मुलायम सिंह और उनके करीबी रिश्तेदार ही जीत पाए है| दलित और मुस्लिम, यादव और मुस्लिम यह सब समीकरण उत्तर प्रदेश के मतदाताओं ने खोखले सिद्ध किये और राज्य में पहली बार भाजपा को 80 में से 71 सिटें दी| उत्तर प्रदेश में की इस जीत का श्रेय, वहाँ ताल ठोक कर बैठे श्री अमित शहा को ही है| जाति आधारित और मुसलमानों को समाज से अलग करने की राजनीति करनेवालों ने, इस चुनाव से सही सबक लेने की आवश्यकता है| 

काँग्रेस की तबाही
इस चुनाव में काँग्रेस पूरी तबाह हुई है| पाँच वर्ष पूर्व, अपने बल पर 206 सिटें जितनेवाली यह पार्टी, इस चुनाव में पचास का आँकडा भी नहीं छूं पाई| उसके खाते में केवल 46 सिटें आई| गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड, गोवा, जम्मू-कश्मीर, ओडिसा और तामिलनाडु इन राज्यों में काँग्रेस का खाता भी नहीं खुल पाया| इनमें से कुछ राज्यों में तो काँग्रेस पार्टी की ही सरकारें थी| इससे पहले इस पाटीं की ऐसी लज्जाजनक दुर्गती कभी नहीं हुई थी| 

चिंता की बात
मुझे यह गंभीर चिंता की बात लगती है| केवल पार्टी के लिए नहीं, संपूर्ण जनतांत्रिक व्यवस्था की दृष्टि से भी| देश में अनेक पार्टियाँ है| उनमें से कुछ विशिष्ट राज्यों तक ही सीमित है| जैसे तृणमूल काँग्रेस केवल पश्‍चिम बंगाल तक| अद्रमुक और द्रमुक तामिलनाडु तक| समाजवादी पार्टी केवल उत्तर प्रदेश तक, जनता दल (सेक्युलर) केवल कर्नाटक तक, शिवसेना केवल महाराष्ट्र तक| इन पार्टियों को न तो अखिल भारतीय दृष्टि है, न समझ, न कोई स्थान| अन्यत्र कही कोई कार्यकर्ता होगे भी लेकिन अखिल भारतीय नीति नही| किसी भी पार्टी के पास विदेश नीति नहीं| तृणमूल काँग्रेस के पास होगी, तो वह केवल बांगला देश तक और अद्रमुक या द्रमुक की केवल श्रीलंका तक सीमित| मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व के गठबंधन को तीन राज्यों में स्थान है, और इस गठबंधन की एक विशिष्ट आर्थिक एवं विदेश नीति भी है| लेकिन उनका अखिल भारतीय स्तर पर विस्तार नहीं और कालबाह्य हुए साम्यवादी विचारों के प्रसार के लिए कोई संभावना भी नहीं है| कम या अधिक ही सही, लेकिन अस्तित्व और विस्तार की केवल दो ही अखिल भारतीय पार्टियाँ है| (1)  भाजपा और (2) काँग्रेस| जनतांत्रिक व्यवस्था की स्वस्थ प्रगति के लिए ऐसी दो पार्टियाँ रहना आवश्यक है, ऐसा मुझे लगता है| इंग्लंड में दो प्रमुख पार्टियाँ है| अमेरिका (युएसए) में भी दो प्रमुख पार्टियाँ है| वहाँ अन्य पार्टियाँ भी होगी| लेकिन प्रमुख दो पार्टियों में ही सत्तांतर होता रहा है| भारत में भी, ऐसी दो पार्टियों की आवश्यकता है| इसलिए काँग्रेस ने अपने आप को संभालना चाहिए| 

काँग्रेस मजबूत होने के लिए
काँग्रेस पुन: मजबूत बने ऐसा लगते समय ही, मेरे ध्यान में आता है कि, काँग्रेस का वर्तमान नेतृत्व जो सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल गांधी तक सीमित है (उसमें प्रियंका गांधी-वड्रा का भी समावेश कर ले), वह काँग्रेस में नई जान नहीं फूँक सकता| नई पीढी को परिवारवाद मान्य नहीं| और, व्यक्तिनुसार विचार करे तो, सोनिया गांधी का ऐसा क्या कर्तृत्व है, जो पार्टी को पुन: शक्ति प्रदान कर सके ? श्रीमती इंदिरा गांधी की बहू, इंदिरा जी के सुपुत्र राजीव गांधी की पत्नी इसके अतिरिक्त उनके पास क्या अर्हता है? गत कई वर्षों से वे संसद की सदस्य है| किसी एक भाषण में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा दिखाई है? जो बात सोनिया गांधी के बारे में है वही राहुल गांधी के बारे में भी है| संसदीय कामकाज में, उन्होंने अपनी कोई छाप छोडी हो, ऐसा एक भी उदाहरण नहीं है| इसलिए मैं विचारपूर्वक कहता हूँ कि, काँग्रेस पार्टी को इस गांधी परिवार से परे विचार करना होगा| दिग्विजय सिंग या गहलोत, या अँटनी जैसे, साठ की आयु के ऊपर के लोगों को छोडकर, आमूलाग्र विचार करना होगा| ज्योतिरादित्य सिंदिया, अजय माकन, मिलिंद देवरा, दीपेन्द्र हुडा, मुकुल वासनिक, राजेन्द्र मुळक, सचिन पायलट, मीनाक्षी नटराजन जैसे पचास से कम आयु के नेताओं ने एक होकर विचार करना चाहिये| इनमें राहुल गांधी औ प्रियंका गांधी-वड्रा भी आ सकते है| इन युवा नेताओं ने संगठन की जड़ों को मजबूत करने का विचार करना चाहिए| सेक्युलरमतलब हिंदूविरोध या मुस्लिम तुष्टीकरण यह भ्रामक विचार परे रखकर अपने मूलभूत सिद्धांत निश्‍चित करने चाहिए| दृष्टि सकारात्मक होनी चाहिए| वृत्ति जाति - पाँति से उपर उठनेवाली, पंथ-संप्रदाय में भेद न करनेवाली होनी चाहिए| इन सबने या इनमें से कुछ ने ही सही प्रथम एक होकर काँग्रेस में पुन: जान डालने के लिए विचारविनिमय करना चाहिए| सोनिया गांधी तथा अन्य ज्येष्ठों का सम्मान रखा जाना चाहिए| उनका ऋण भी मान्य करना चाहिये| लेकिन पार्टी का नेतृत्व फिर पुराने नेताओं के हाथों में न जाने देकर, नए नेतृत्व और नए कार्यक्रम का विचार करना चाहिये| मेरे मतानुसार काँग्रेस में नवचैतन्य संचरित करने के लिए इससे हटकर अन्य कोई दूसरा मार्ग नही है| 

- मा. गो. वैद्य
नागपुर,
18-05-2014

Friday, 21 February 2014

यह षडयंत्र किसका? और किस लिये?
                                         -मा. गो. वैद्य
समझौता एक्सप्रेस, अजमेर दर्गाह और मक्का मस्जिद (हैद्राबाद) बॉम्बस्फोट मामले में एक आरोपी, स्वामी असीमानंद जी, जो  अभी हरयाणा के अम्बाला जेल में बंद हैं, के एक कथित बयान ने हंगामा खडा कर दिया । उस बयान में, असीमानंद जी ने यह कहा है, कि समझौता एक्सप्रेस, अजमेर शरीफ आदि स्थानों पर जो बम धमाके हुये, उनके लिये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विद्यमान सरसंघचालक, जो उस समय संघ के सरकार्यवाह थे श्री मोहन जी भागवत और संघ के केन्द्रीय कार्यकारी मण्डल के एक सदस्य श्री इन्द्रेश कुमार जी से परामर्श हुआ था और उन्हीं की प्रेरणा से ये धमाके किये गये थे। असीमानंद जी का यह आरोपित कथन, ‘कॅराव्हाननामक पत्रिका  के 1 फरवरी 2014 के अंक में प्रकाशित हुआ है। यह बयान उन्होंने  लीना गीता रघुनाथ इस महिला को दिये साक्षात्कार का हिस्सा है। यह स्पष्ट है कि रा. स्व. संघ हिंसात्मक कारवाईयों का पक्षधर है यह बताना ही इस तथाकथित वक्तव्य का मकसद है।
संघ और हिंसा
हम कई वर्षों से संघ को जानते हैं। और हम पूरे विश्वास से कह सकते हैं कि संघ का ना सिद्धान्त ना व्यवहार हिंसा को प्रोत्साहित करनेवाला है। हम यह भी जानते हैं कि हिंसा का सिद्धान्तत: गौरव करनेवाली विचारधाराएं हैं और हिंसा का आचरण करनेवाले आन्दोलन भी हैं। सभी लोक नक्षलवादी, पीपल्स वॉर ग्रुप, लष्कर-ए-तोयबा, हिजबुल मुजाहिदीन, सीमी आदि नामों से चलनेवाले हिंसात्मक आन्दोलनों से परिचित हैं। संघ का कार्य आरम्भ से ही राष्ट्रीय चरित्रसम्पन्न व्यक्ति निर्माण का है, जिस में हिंसा को कोई स्थान ही नहीं रह सकता। यह बात, जिन्होंने अपनी आँखो पर द्वेष के चष्मे लगाये नहीं है, ऐसे सब लोग भलीभाँति जानते हैं।
सुनियोजित षडयंत्र
उपरिलिखित समाचार की पृष्ठभूमि यदि हम ध्यान में लेते हैं, तो यह समझ में देर लगने की आवश्यकता नहीं कि यह एक सुनियोजित षडयंत्र है। प्रकाशित समाचार बताता है कि लीना गीता रघुनाथ नामक एक महिलाने अम्बाला के जेल में जाकर असीमानंद जी का साक्षात्कार लिया। हम भी कारागृह में रह चुके हैं। एक बार नहीं, दो बार। किन्तु कोई पत्रकार हम से मिल नहीं पाया। कारण, आरोपी को अखबार से मिलने की अनुमति ही मिलती नहीं थी। अब जेल के प्रशासन के नियम बदल गये होंगे तो बात अलग है। यह भी एक मजे की बात है कि उक्त महिला एक पत्रकार के नाते असीमानंद जी से मिलने नहीं गई थी। वह एक वकील के नाते गई थी। क्यौ? यह बहाना इसी लिये कि वकील आरोपी से मिल सकता है?। किन्तु स्वामी जी ने उन्हें बताया कि उनके अपने अलग वकील हैं और उन्हें अन्य वकील की आवश्यकता नहीं है। यह घटना है 9 जनवरी 2014 की। किन्तु इस वकील महोदया का असीमानंद जी के बारे में करुणा का उबालशान्त नहीं हुआ। वे फिरसे दिनांक 17 जनवरी को अम्बाला जेल गयी। इस समय भी असीमानंद जी ने अपने मामले में उनसे बात करने से इन्कार किया। आश्‍चर्य लगता है कि पक्षकार बार बार कहता है कि मुझे अन्य वकील की आवश्यकता नहीं है और फिर भी वह वकील उससे आग्रह करता है। संभव है कि लीना गीता रघुनाथ व्यवसाय से वकील होगीही, किन्तु वह अपनी व्यवसाय के प्रामाणिक व्यवहार के लिये जेल नहीं गई थी। वह एक अखबार की संवाददाता के रूप में या किसी अन्य संस्था की एजन्ट बनकर गई थी। इस का मतलब यह निकलता है कि यदि सचमुच वह पेशे से वकील हो, तो उसने अपने व्यवसाय से द्रोह किया है। इस ढंग का बिकाऊ माल अपने व्यवसाय में हो इसकी शरम सभी वकीलों को अवश्य लगेगी।
यदि कोई व्यक्ति वकील का नकाब पहनकर काम करने के लिये प्रस्तुत हुआ हो, तो अवश्य समझना चाहिये कि वह किसी अन्य का एजन्ट बनकर आया होगा। लीना गीता रघुनाथ किस की एजन्ट होगी? वह तो स्वयं होकर कुछ भी कबूल नहीं करेगी। किन्तु लोकसभा के चुनाव की समीपता को तथा घटना अम्बाला जेल की, जो कि काँग्रेस शासित हरयाणा राज्य में स्थित है, यह ध्यान में लेकर, यह षडयंत्र काँग्रेस पार्टी ने रचा है, ऐसा किसी ने निष्कर्ष निकाला, तो उसे दोष नहीं दिया जा सकता। इस तर्क को पुष्टि इस कारण से भी मिल सकती है कि श्री राहुल गांधी, तुरन्त गुजरात में प्रचार के लिये गये और उन्होंने वहाँ रा. स्व. संघ की जहरीलीनिंदा की। पहले तो काँग्रेसजन यही कहते थे कि गांधी जी की हत्या में संघ की शिरकत थी। किन्तु जब इस प्रकार की अनर्गल बातों ने उनको माफी मांगने के लिये मजबूर किया, तब शैली बदली, (मन नहीं बदला) कहने लगे कि संघ की विषैली विचारधारा के कारण गांधी जी की हत्या हुई। श्री राहुल गांधी का वक्तव्य इसका का ठोस प्रमाण है।
थोडा पुराना इतिहास
राहुल जी नये हैं। अननुभवी हैं। संभव है उनका पूरा इतिहास अज्ञात हो। अत: उनके लिये तथा अन्य तरुण मतदाताओं के लिये कुछ तथ्यों को यहाँ प्रस्तुत करता हूँ।
दिनांक 30 जनवरी को गांधी जी की हत्या हुई। दिनांक 31 जनवरी और 1 फरवरी की बीच की मध्यरात्रि में उस समय के सरसंघचालक श्री मा. स. गोलवलकर उपाख्य श्रीगुरुजी को गिरफ्तार किया गया। वह भी इं. पि. कोड की धारा 302 के तहत। मानों श्री गोलवलकर ही पिस्तौल लेकर दिल्ली गये थे। और उन्होंने ही महात्मा जी पर गोली दागी थी। किन्तु चंद दिनों के बाद ही सरकार की अक्ल ठिकानेपर आयी और धारा 302 को हटाकर प्रतिबंधित कानून (preventive law) के अंदर वह गिरफ्तारी दिखायी गयी। उस समय केवल श्रीगुरुजी को ही बंदी नहीं बनाया था। सैकडों अन्य कार्यकर्ताओं को भी पकडा था। कमसे कम बीस हजार मकानों की तलाशी ली गई थी। किन्तु रंचमात्र भी प्रमाण नहीं मिला। गांधी जी की हत्याकांड में जो शरीक थे उनकों पकडा गया। उनपर न्यायालय में मामला चला। जो दोषी पाये गये उनको सजा हुई। किन्तु संघ के किसी भी कार्यकर्तापर मुकदमा दायर नहीं हुआ था। क्यौ? कारण स्पष्ट है कि वे सारे बेगुनाह थे। किन्तु संघ पर पाबंदी लगाई गयी थी और वह हटायी नहीं गई थी।
प्रतिबन्ध को हटाने के लिये फिर संघ ने अत्यंत शान्तिपूर्ण ढंग से सत्याग्रह किया। 70 हजार से भी अधिक लोगों ने गिरफ्तारी दी। फिर दो मध्यस्थ सामने आये। एक थे पुणे से प्रकाशित होनेवाले केसरीके सम्पादक श्री ग. वि. केतकर। उनके अनुरोधपर सत्याग्रह स्थगित किया गया। फिर भी प्रतिबन्ध नहीं हटा। फिर आये मद्रास इलाके के भूतपूर्व एडवोकेट जनरल श्री टी. आर. वेंकटराम शास्त्री। उनके अनुरोध का आदर कर संघ ने अपना संविधान लिखित रूप में पेश किया। फिर भी प्रतिबन्ध नहीं हटा। बाद में श्रीगुरुजी ने भी स्पष्ट शब्दों में बता दिया कि इस के आगे वे सरकार से कोई पत्राचार नहीं करेंगे। फिर सरकार अडचन में आयी। सरकार के ही पहल से  पं. मौलिचंद्र शर्मा मध्यस्थ बनकर आये। श्रीगुरुजी सरकार को कुछ भी लिख देने के लिये तैयार नहीं थे। फिर बीच का रास्ता ढूँढा गया कि श्रीगुरुजी सरकार को कुछ न लिखें, पंडित मौलिचंद्र जी जो कुछ मुद्दे उठायेंगे, उनके उत्तर गुरुजी देंगे। और श्रीगुरुजी ने शिवनी के जेल में पं. मौलिचंद्र जी को एक विस्तृत पत्र लिखकर संघ की भूमिका विशद की। श्रीगुरुजी के पत्र का प्रारम्भ ही  My dear Pandit Moulichandraji ऐसा है। यह पत्र दि. 10 जुलाय 1949 का है।  वह पत्र लेकर पंडित मौलिचंद्र जी दिल्ली गये और 12 जुलाय को संघ पर का प्रतिबन्ध हटाया गया। पं. मौलिचंद्र जी को लिखे पत्र में वेही सारे मुद्दे हैं जो श्रीगुरुजी ने दिल्ली की वार्ताकार परिषद में 2 नवम्बर 1948 में प्रस्तुत किये थे।
राहुल जी, अब आप ही सच बतायें कि आपके परदादा जी सरकार के प्रमुख रहते हुये भी, उनकी सरकारने इस विषैलेसंगठन को मुक्त क्यौं किया? इस प्रक़ार की नासमझी के लिये आप की आलोचना का चुभनेवाला एकाध शब्द तो भी उस दिशा में जाने दीजिये ना।
और सरदार पटेल
यह भी ध्यान में लेना जरुरी है कि तथाकथित जहरीलीविचारधारा को माननेवाले संगठन के बारे में सभी काँग्रेसजनों का मत एकसा नहीं था। गांधी जी की हत्या के एक-दो दिन पहले, अमृतसर की एक आम सभा में भाषण देते हुये, उस समय के अपने प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल जी नेहरू ने कहा था कि हम आरएसएस को जडमूल से उखाड फेंक देंगेइस प्रकार विचार रखनेवाले और भी कुछ लोग थे। श्री गोविन्द सहाय, जो उस समय यु. पी. की सरकार में संसदीय सचिव थे, ने एक पुस्तिका प्रकाशित कर संघ को फॅसिस्ट कह कर उस पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग की थी। गांधी जी की हत्या से उनको सुनहरा मौका मिल गया । किन्तु, उसी समय के केंद्र सरकार में उपप्रधान मंत्रिपद पर विराजमान सरदार पटेल का मत एकदम इस के विरुद्ध था। सरदार पटेल के, लखनौ के एक भाषण का जो वृत्त चेन्नई से (उस समय मद्रास) प्रकाशित होनेवाले द हिंदूदैनिक के 7 जनवरी 1948 के अंक में प्रकाशित हुआ था, उस में उन्होंने कहा था-
He (Sardar Patel) said, "In the Congress those who are in power feel that by virtue of their authority they will be able to crush the RSS. You cannot crush an organisation by using the 'danda'. The danda is meant for thieves and dacoits. After all the RSS men are not thieves and dacoits. They are patriots who  love their country."
विषाक्त विचारधारा रखनेवाले संघ के बारे में ऐसे प्रशांसोद्गार निकालनेवाले सरदार के सारे पुतले, राहुलजी आप उखाड फेंके। जहरीलेसंगठन को देशभक्तकहना कितना घोर सत्यापलाप है! राहुलजी, और एक मजे की बात आगे भी घटी। 1963 के 26 जनवरी के गणतंत्रदिन समारोह में आयोजित संचलन में हिस्सा लेने के लिये संघ को निमंत्रण मिला था। किसने दिया था यह निमंत्रण, राहुलजी, आप जानते हैं? आपके परदादा ने, पं. जवाहरलाल जी ने! अत्यंत सौम्य शब्दों में क्यौ न हो आप इस की कभी आलोचना करने का साहस दिखायेंगे?
संघ पर की पाबंदी अचानक हटने के कारण, एक ऐसा वातावरण निर्माण किया गया था कि संघ ने सरकार की कुछ शर्तें मान ली। इस के परिणामस्वरूप पाबंदी हटायी गयी। इस बारे में अधिक न लिखते हुये मैं मुंबई लेजिस्लेटिव असेम्ब्ली में जो प्रश्‍नोत्तर हुये उन्हें ही यहाँ उद्धृत करता हूँ। प्रश्‍नकर्ता विधायक है लल्लुभाई मानकजी पटेल (सुरत जिला) और तिथि है 20-09-1949। उस समय जनसंघ का जन्म ही हुआ नहीं था। अत: प्रश्‍नकर्ता कोई संघ समर्थक होने का सवाल नहीं उठेगा। वे प्रश्‍न और उन के उत्तर ऐसे है-
Will the Hon. Minister of Home and Revenue be pleased to state :
a. Whether it is a fact that the ban on RSS has been lifted.
b. If so what are the reasons for lifting the ban.
c. Whether the lifting of the ban is conditional or unconditional.
d. If conditional, what are the conditions?
e. Whether the leader of the RSS has given any undertaking to the Government.
f. If so, what is the undertaking?

Mr. Dinkar rao n. Desai for Mr. Morarji R. Desai :

a. Yes.
b. The ban was lifted as it was no longer considered necessary to continue it.
c. It was unconditional.
d. Does not arise.
e. No.
f. Does not arise.

और एक प्रमाण
पाकिस्तान में भारत के राजदूत और कुछ समय केंद्रीय मंत्री रहे डॉ. श्रीप्रकाश जी के पिताश्री भारतरत्न डॉ. भगवानदास का यह निवेदन है।
"I have been reliably informed that a number of youths of the RSS... were able to inform Sardar Patel and Nehruji in the very nick of time of the Leaguers intended "coup" on September 10, 1947, wherby they had planned to assassinate all Members of Government and all Hindu Officials and thousands of Hindu Citizens on that day and plant the flag of "Pakistan" on the Red Fort."
"...It these high-spirited and self-sacrificing boys had not given the very timely information to Nehruji and Patelji, there would have been no Government of India today, the whole country would have changed its name into Pakistan, tens of millions of Hindus would have been slaughtered and all the rest converted to Islam or reduced to stark slavery.
"...Well, what it the net result of all this long story? Simply this- that our Government should utilise, and not sterilise, the patriotic energies of the lakhs of RSS youths."

सारांश यह है कि चुनाव का मौसम आ गया है। तो समझ लेना चाहिये कि संघपर ऐसे बेतुकी बकवासपूर्ण आरोप होंगे। विधानसभाओं के चुनाव के समय भी हमने देखा था ना, कि काँग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने जाहीर वक्तव्य किया था कि संघ में बम बनाने की शिक्षा दी जाती है। इस प्रकार के बकवास का क्या परिणाम निकला यह पूरे देश ने देखा है। इस नये झुठाई का भी परिणाम वही होगा।
मा. गो. वैद्य
नागपुर
दि. 12-02-2014