Friday, 24 October 2014

विजिगीषा का महत्त्व


विजिगीषा का अर्थ है, विजयकी इच्छा, विजय की आकांक्षा यह विजिगीषा मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने में अत्यंत आवश्यक है। भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता में बताते हैं कि विश्‍व में दो प्रकार के लोग होते हैं। एक दैवीगुण संपदावाले और दुसरे आसुरी गुण संपदावाले। भगवान के शब्द हैं, ‘द्वौ भूतसर्गो लोकेस्मिन्, दैव आसुर एव च’ (अध्याय 16, श्‍लोक 6)। इन दैवी संपदावाले लोगों और आसुरी संपदावाले लोगों में संघर्ष अनिवार्य है। हम संघर्ष टालने का कितना भी प्रयत्न करें, वह आसुरी संपदावालों के हठधर्मिता के कारण असफल हो जाता है। फिर संघर्ष अपरिहार्य होता है। इस संघर्ष में विजय प्राप्त करना नितराम आवश्यक हो जाता है। यह विजय की आकांक्षा ही विजिगीषा है।

रामायण का उदाहरण
रामायण का उदाहरण लीजिये। रावण सीता का अपहरण करता है। अंगद ने मनाया, विभीषण ने मनाया, फिर भी रावण मानता नहीं। मातृवत् परदारेषु यह अपनी संस्कृति का एक आदर्श है। परस्त्री को माता के समान देखो, यह इसका अर्थ है। रावण नहीं मानता। युद्ध अटल हो जाता है। फिर युद्ध से डरना नहीं चाहिये।  प्रभु रामचंद्र को युद्ध करना ही पडता है। और वे इसमें विजय पाते हैं। 

भगवान श्रीकृष्ण
भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में भी ऐसाही प्रसंग आता है। कौरव और पाण्डवों में युद्ध होता है। द्यूत में कौरवों की ओर से कुटिलमति शकुनी है। और पाण्डवोंकी ओर से युधिष्ठिर हैं। द्यूत में युधिष्ठिर हार जाते हैं। द्यूत की शर्त के कारण युधिष्ठिर को अपने भाईयों के साथ बारह वर्ष वनवास में, और एक वर्ष अज्ञातवास में रहना पडता है। अज्ञातवास में यदि उन को किसीने पहचाना तो उनको फिरसे 12 वर्षों का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास भोगना पडेगा। यदि इस शर्त का परिपालन हुआ, तो कौरव प्रमुख दुर्योधन पाण्डवों का संपूर्ण राज्य उन्हें लौटाएगा। पाण्डव शर्त पूर्ण कर आते हैं। किन्तु दुर्योधन उनका राज्य लौटाने से मुकर जाता है। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं मध्यस्थ बनकर आते हैं। और कहते हैं कि पूरा राज्य रहने दो, केवल पाँच गाँव दीजिये। दुर्योधन का उत्तर रहता है, पाँच गाँवों की क्या बात करते हो, सुई के नोंक पर रह सकेगी इतनी भी जमीन नहीं मिलेगी।

अब युद्ध अटल हो जाता है। और युद्ध में विजय प्राप्त करना अनिवार्य रहता है। कुरुक्षेत्र के रण में 18 दिनों तक पाण्डवों और कौरवों के बीच घनघोर युद्ध होता है। इतना घनघोर की 18 अक्षौहिणी की विशाल सेना में से केवल दस लोग जीवित बचते हैं। पाण्डवों में सात और कौरवों में तीन. बस्स! 
कौरवों के पक्ष में बडे बडे रणधुरंधर हैं। भीष्माचार्य हैं, द्रोणाचार्य हैं, महारथी कर्ण हैं। विजय प्राप्त करने का मतलब होता है,इनको परास्त करना। मतलब होता है इनको मारना। फिर भगवान कृष्ण अपना कौशल दिखाते हैं। वे शत्रुओं की कमजोरी का ध्यान रखते हैं। युद्ध में इसकी बहुत आवश्यकता होती है। विजय पानी है तो दुष्मनों की दुर्बलता जाननी ही पड़ती है। इसलिए भगवान कृष्ण ने भीष्माचार्य के सामने शिखण्डी को खडा किया। भीष्माचार्य की प्रतिज्ञा थी कि जो नर भी नहीं, नारी भी नहीं,नपुंसक है, उसपर शस्त्र नहीं चलाएंगे। और अर्जुन ने शिखण्डी के पीछे खडे होकर भीष्माचार्य के ऊपर शरवृष्टि की। भीष्माचार्य रथ में गिर गये। कोई कहेगा कि यह पापमार्ग है। नहीं। हमनें नित्य संदर्भ ध्यान में लेना चाहिए। भीष्माचार्य की विजय होती तो राज्य भीष्माचार्य का नहीं होता। वह दुर्योधन का ही होता। उस दुर्योधन का कि जिसको कपट द्यूत से परहेज नहीं थी। अपनी भाभी को भर सभा में विवस्त्र करने की शरम नहीं थी। मतलब हैं, भीष्माचार्य जैसे ज्ञानी, सत्यप्रतिज्ञ पुरुष व्यक्ति का राज्य नहीं होता। वह दुष्ट दुर्योधन का होता। और भीष्म पितामह उसकी ओर से रणमैदान में खड़े थे। उन को मारना सत्पक्ष की विजय के लिए अवश्यंभावी था। 

अश्‍वत्थामा मृत:
भीष्माचार्य के पश्‍चात द्रोणाचार्य कौरव-सेना के सेनापति बने। वे पाण्डवों के भी गुरु थे। किन्तु दुर्योधन के पक्ष में थे। द्रोणाचार्य भी अत्यंत पराक्रमी थे। किन्तु उन की एक दुर्बलता थी। अपने पुत्र अश्‍वत्थामा पर उनका असीम प्रेम था। उनको परास्त करने के लिए अश्‍वत्थामा को मारना आवश्यक था। भीम ने अपना ही एक बडा हाथी, जिसका नाम अश्‍वत्थामा था, उसको मार डाला और द्रोणाचार्य सुन सके इतनी जोर से चिल्लाया कि अश्‍वत्थामा हत:। द्रोणाचार्य ने उसकी बात को नहीं स्वीकारा और अभूतपूर्व पराक्रम प्रकट कर पाण्डवों की सेना की जबरदस्त हानि की। तब ़श्रीकृष्ण की सलाह से कि इस समय सत्यात् ज्याय: अनृतं वच: यानी इस समय सत्य से असत्य बोलना श्रेयस्कर हैं, युधिष्ठिर ने अश्‍वत्थामा मृत: यह कहा। आगे नरो वा कुंजरो वायानी आदमी या हाथी नहीं जानता यह भी कहा। किन्तु रणवाद्यों की गंभीर आवाज में द्रोणाचार्य उसे नहीं सुन सके। उन्होंने शस्त्र नीचे डाल दिए। और धृष्टद्युम्न ने उनका शिरश्र्छेद किया। 

क्व ते धर्मस्तदा गत:
कर्ण के बारे में भी यही बात है। द्रोणाचार्य के पश्‍चात कर्ण कौरव सेना का सेनापति बना। अर्जुन के साथ युद्ध करते समय उसके रथ का एक पहिया जमीन में धस गया। तब, रथ से नीचे उतरकर कर्ण अर्जुन से कहता है, ‘हे अर्जुन मैं नि:शस्त्र हूँ। और नि:शस्त्रों पर वार करना यह अधर्म है। तू धर्मयुद्ध के नियमों का जानकार है। अत: जरा रुक, मैं रथ का पहिया उपर उठाकर, तुझसे लडूंगा। मैं ना तुझसे डरता हूँ, ना कृष्ण से। तब सचमुच अर्जुन थम जाता है, तब श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘इस पर बाण चलाओ। दुष्ट लोग जब संकट में पडते हैं, तब उनको धर्म का स्मरण होता है। और कर्ण से सवाल करते हैं कि जब द्रौपदी को भर सभा में विवस्त्र करने का आप लोगों ने प्रयास किया तब तुम्हारा धर्म कहाँ गया था। क्व ते धर्मस्तदा गत:। धर्मयुद्ध का नियम है कि एक व्यक्ति पर अनेकोंने शस्त्राघात नहीं करना चाहिए। तुम अनेकों ने अभिमन्यु को घेर कर उसकी हत्या की। तब क्व ते धर्मस्तदा गत: क्व ते धर्मस्तदा गत:’, इस वचन से अन्त होनेवाले, भगवान श्रीकृष्ण के नौ प्रश्‍न महाभारत के कर्णपर्व में है। तात्पर्य यह है कि विजय पाने हेतु,शत्रु की दुर्बलताओंका भी ध्यान रखना चाहिए। हम भारतीय यह बात भूल गए। अत: पराक्रमी होते हुए भी हमें हार खानी पडी। इसके दो उदाहरण मैं यहां प्रस्तुत करता हूँ। 

पृथ्वीराज और घोरी
पहला उदाहरण पृथ्वीराज चौहाण का है। महम्मद घोरी ने पृथ्वीराज चौहाण के राज्यपर आक्रमण किया। लडाई में घोरी की हार हुई। घोरी पकडा गया। किन्तु घोरी ने गयावया करते ही पृथ्वीराज ने उसे छोड दिया। क्यों? उसने गलती से नहीं, सोच समझ के आक्रमण किया था। उसका दण्ड उसको मिलना आवश्यक था। एैसे ही राजा को युक्तदण्ड कहते हैं। घोरी मुक्त होने का बाद स्वस्थ नहीं बैठा। उसने फिर से आक्रमण किया। अब बारी पृथ्वीराज के हार की थी। घोरी ने उसे छोडा नहीं। वह अपने राज में पृथ्वीराज को ले गया। मुसलमानों की रीत का अवलंबन कर उसको पहले अन्धा किया। और बाद में उसकी कत्ल की। विजय की परिपाटी पृथ्वीराज भूल गए। भारत में पश्‍चिम से आनेवाली मुसलमानी सत्ता का प्रारंभ हुआ। 

अल्लाउद्दीन खिलजी
दुसरा उदाहरण अल्लाउद्दीन खिलजी का। उसने चित्तौेड पर आक्रमण किया। क्योंकि चित्तौड नरेश की लावण्यवती पत्नी पद्मिनी उसे चाहिये थी। परस्त्री की चाह रखना अपने संस्कृति में महान पाप बताया हैं। किन्तु अल्लाउद्दीन भारत की संस्कृति को माननेवाला नहीं था। उसने पद्मिनी की बेशर्मी से मांग की। जब चित्तोड काबीज करना सम्भव नहीं हुआ, तो उसने शान्ति का नाटक रचा। कहा कि, ‘पद्मिनी नहीं चाहिए, उस लावण्यवती को केवल देखना चाहता हूँ। फिर भी राजपूत नहीं माने।  तो अल्लाउद्दीन ने कहा कि केवल आइने में उसे देखूंगा और चला जाऊँगा। राजपूत, अल्लाउद्दीन चित्तौड क्यों आया था, यही भूल गए। आयने में प्रतिबिम्ब दिखाने से लडाई टल सकती है, ऐसा सोचकर उसके लिए कबूल हो गये। अल्लाउद्दीन आया और आयने में पद्मिनी का सौंदर्य देखकर खुश हुआ। इस सब बातचीत में विश्‍वास निर्माण हुआ। और पद्मिनी के पतिदेव, मेहमान का आदर करने के लिए अल्लाउद्दीन को उसकी छावनी में छोडने के लिए उसके साथ गये। अल्लाउद्दीन ने वहीं उसे कैद किया और कहा कि पद्मिनी मिलेगी तभी छुटकारा होगा। राजपूत तो इसे माननेवाले नहीं थे। फिर लडाई हुई। बातचीत के दौरान, अल्लाउद्दीन के दूतों का किलेपर कई बार आवागमन हुआ। किले के दुर्बल स्थानों को उन्होंने देख लिया। वे किलेपर चढ गए। अपनी सतीत्व की रक्षा के लिए दो हजार राजपूत रमणीयोंने जौहर कर अपने देह अग्नि को समर्पित किए। पद्मिनी अल्लाउद्दीन को नहीं मिलीं। किन्तु चित्तौड उसके कब्जे में आ गया। विजिगीषा होती, तो अल्लाउद्दीन जब स्वयं पद्मिनी के रूप को आयने में देखने आया, तब जिंदा नहीं लौटता।

छत्रपति शिवाजी
यह विजिगीषा छत्रपति शिवाजी महाराज में थी। विजापुर के बादशहा का सेनापती अफजल खाँ, दरबार में शिवाजी को जिन्दा या मरा पेश करता हूँँ, इस प्रतिज्ञा के साथ बडी भारी सेना लेकर निकला। शिवाजी के पास सेना छोटी थी। मैदान में अफजलखान कामुकाबला नहीं किया जा सकता था। अफजलखान की नीति थी, शिवाजी को कैसे भी करके मैदान में लाना। शिवाजी की नीति थी, कि अफजलखान को संकरी घाटी में लाना। शिवाजी को क्रोध के वश में लाने के लिए, अफजलखान ने समूचे महाराष्ट्र का अत्यंत पवित्र स्थल पंढरपुर का मंदिर भ्रष्ट किया। फिर भी शिवाजी शान्त ही रहे। फिर शिवाजी की कुलदेवता तुलजा भवानी के मन्दिर को उसने भ्रष्ट किया। फिर भी शिवाजी शान्त। शिवाजी ने भयभीत होने का बहाना धारण किया। मित्रता का हाथ बढाया। और अफजलखान को प्रतापगड की घनी झाडी में आने को प्रोत्साहित किया। दोनों की व्यक्तिगत भेेंट तय हुई। आलिंगन होते ही शिवाजी ने अपने बाघनख उसके पेट में घुसा दिए। कुछ लोग कहते हैं कि पहला वार अफजलखान ने किया और बाद में आत्मरक्षा के लिए शिवाजी ने बाघनख चलाए। यह सहीं नहीं है। मिर्झा राजा जयसिंह को लिखे पत्र में शिवाजी ने स्वयं लिखा है कि अफजलखान के प्रसंग में मैं पहला वार नहीं करता तो यह खत मैं कैसे लिख पाता। इस संपूर्ण प्रकरण में शिवाजी महाराज एक क्षण भी नहीं भूले कि अफजलखान उन्हें जिंदा या मरा, आदिलशाह के दरबार में हाजिर करने का बीडा उठा कर निकल पडा था। अल्लाउद्दीन के प्रसंगपर यदि चित्तौडगढ पर शिवाजी होते तो अल्लाउद्दीन जिंदा नहीं लौट पाता। 

विजिगीषा की महत्ता
मनुष्य जीवन में, जब आसुरी गुणोंवालों से मुकाबला होता है, तब विजय ही एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए। आसुरी शक्ति को परास्त करना यहीं एकमात्र उद्देश्य होना चाहिए। अन्यथा आसुरी शक्तिवालों से दुनिया की रक्षा असंभव है। आखिर कीर्ति विजयी पुरुष की ही होती है।  महाकवि कालिदास अपने रघुवंश महाकाव्य की प्रस्तावना में लिखते हैं कि मैं, किन गुणोंसे युक्त रघुवंश के राजाओं का वर्णन करने जा रहा हूँ। उनके अनेक गुणों में से ‘‘यथाकालप्रबोधिनाम्’’ (उचित समय पर जागनेवाले), ‘यथापराधदण्डानाम्’ (अपराध के अनुरूप दण्ड देनेवाले) और सबसे महत्त्वपूर्ण है यशसे विजिगीषूणाम्’ (कीर्ति के लिए विजय की आकांशा रखनेवाले) इन गुणों का भी वर्णन करता है। विजिगीषा की ऐसी महत्ता है। राजपूत अत्यंत पराक्रमशाली थे, किन्तु विजयशाली नहीं बन पाए।

-मा. गो. वैद्य
2.10.14.


Wednesday, 22 October 2014

बच्चों की शिक्षा और परिवार

बच्चों की शिक्षा का प्रारंभ उनके परिवार से ही होना चाहिये। इस के लिये माता का बडा महत्त्व है। वीर अभिमन्यू जब अपनी माँ के गर्भ में था, तभी उसने भगवान् श्रीकृष्ण से चक्रव्यूह का भेद करने की कला सीख ली थी। इस प्रसंग को कपोलकल्पित समझकर उस पर अविश्‍वास करना योग्य नहीं। नया विज्ञान भी कहता है कि गर्भ पाँच महिनों का होने पर भ्रूण को संवेदना प्राप्त होती हैं। अनेक शिक्षित महिला डॉक्टर गर्भसंस्कार केंद्र चलाते हैं। गर्भवती स्त्री के वाचन का, व्यवहारों का तथा संस्कारों का भी परिणाम भ्रूणपर होता है।


 माता का सान्निध्य
मेरी दृष्टि से बच्चों की आयु के छ: वर्ष पूर्ण होने तक, उन्होंने अपनी माता के साथ ही रहना चाहिये। मैं प्राथमिक वर्गों के पूर्व, शिक्षा देने वाली व्यवस्था से अनुकूल नहीं हूँ। आज शिक्षित महिलाएं नौकरी करती हैं। डेढ-दो साल के बच्चों को एक तो नौकरानी के हाथ सौंपती हैं,या पालनाघर में भेजती हैं। और तीन साल पूरे होते ही उसे स्कूल भेजती हैं। यह पद्धति संस्कारों की दृष्टि से ठीक नहीं है। आखिर शिक्षा का उद्देश्य क्या है। पैसे कमाने की कला सिखाना यह शिक्षा का उद्देश्य नहीं हो सकता। शिक्षा के कारण व्यक्ति, समाज का अच्छा, शीलवान्,सभ्य नागरिक बने, यही शिक्षा का सही उद्दिष्ट है। और जिस वातावरण में, वह संस्कारक्षम अवस्था में रहता है, उस वातावरण का बडा महत्त्व है। ऐसा वातावरण परिवार में ही निर्माण करना सुलभ है। 


एक प्रयोग
बच्चों को अच्छे संस्कार प्राप्त हो इस लिये गर्भवती ने भी अच्छी किताबे पढनी चाहिये। हमने अठरा वर्षों तक अपने घर में चातुर्मास में प्रतिदिन रात को 9 से 10 बज तक अच्छे किताबों के सामूहिक वाचन का कार्यक्रम चलाया था। छोटे से छोटे बच्चों से लेकर, घर के सब लोग उस में शामिल हो यह नियम था। अडोस-पडोस के कुछ परिवार भी आते थे। अच्छे विचारों का आप ही आप प्रक्षेपण होता था। इस के सुफल हमने देखे हैं। हर घर में इस प्रकार अपने परिवारजनों के लिये, वर्ष में कुछ समय तक यह सामूहिक वाचन का प्रयोग हो। परिवारजनों के ज्ञान की भी वृद्धि होगी और संस्कार भी होंगे। संस्कार का अर्थ अच्छा होना। जैसा है वैसा रहना यह प्रकृति है। पशु प्रकृति से ही चलते हैं। किन्तु मानव संस्कृति-सम्पन्न हो सकता है। इस हेतु संस्कारों का विशेष महत्त्व है। संस्कार यानी वे उपाय हैं जिनसे मनुष्य शीलवान्, बलवान्, विजिगीषु और देशाभिमानी बन सकता है। ऐसे मनुष्य ही अपने समाज का गौरव बढा सकते है।


 नौकरी का सवाल
कोई सवाल करेगा कि क्या महिलाओं ने नौकरी नहीं करनी चाहिये। मैं कहूँगा कि अवश्य करें। किन्तु छोटे से छोटा बच्चा छ: वर्षों का होने के बाद। अच्छे परिवारों में महिलाओं के नौकरी की आर्थिक दृष्टि से आवश्यकता भी रहती नहीं। शिक्षित होने पर नौकरी करनीही चाहिये यह कौनसी रीत है। महिलाएं निजी व्यवसाय भी कर सकती हैं। ट्यूशन क्लासेस भी चला सकती हैं। आयु की जिस अवस्था में बच्चा अच्छे संस्कार ग्रहण कर सकता है, उस अवस्था में संस्कार देने की व्यवस्था हो, यह मेरे प्रतिपादन का मतलब है। 


परीक्षा की व्यवस्था
बच्चों को शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार हो, यह बात अब सर्वमान्य हो गयी है। वह ठीक ही है। किन्तु छ: वर्षों का होने के बाद ही वह पाठशाला जाये। आज के जमाने में गुरुकुल की व्यवस्था फिर से नहीं लाई जा सकती। किन्तु जैसा शिक्षा लेने का अधिकार है, वैसाही शिक्षा देने का भी अधिकार हो। शासन के द्वारा परीक्षा लेने की व्यवस्था हो। चार वर्षों के बाद, तथा 7 वी और 10 वी के पश्‍चात्, ऐसी शासन पुरस्कृत, किन्तु स्वत: में स्वायत्त और स्वतंत्र व्यवस्था हो। प्राथमिक, पूर्व माध्यमिक और माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर यह व्यवस्था बच्चों की परीक्षा लेगी। और उनके आगे बढने का मार्ग प्रशस्त करेगी। 


राष्ट्र के लिये
बच्चा पाठशाला में जाने लगने के पश्‍चात भी अपने घर का वातावरण संस्कारों के अनुकूल रखने का दायित्व माता-पिता का है। ऐसे प्राप्त संस्कार बच्चों को आयु के अठारह वर्ष पूर्ण होने के बाद उन्हे स्वतंत्रता रहे। मुझे विश्‍वास है कि संस्कारक्षम आयु में प्राप्त संस्कारों के कारण वह सभ्य, सच्छील, स्वाभिमानी, राष्ट्राभिमानी नागरिक के नाते अपने को प्रस्तुत करेगा। जिस से अपना राष्ट्र भी बडा होगा। आखिर राष्ट्र भी क्या होता है? राष्ट्र यानी लोग ही होते हैं। People are the Nation.और जैसे लोग होंगे वैसाही राष्ट्र होगा। लोगों से ही राष्ट्र बनता है। किसी व्यवस्था से नहीं। 
-मा. गो. वैद्य
दि. 13-10-2014


Tuesday, 19 August 2014

हिन्दू धर्म की विशालता

समादरणीय श्री ब्रह्मविद्यानंदजी महाराज
सादर प्रणाम

मेरा लेख जो शंकराचार्य, साईबाबा और हिन्दू धर्मइस शीर्षक से र्मैने लिखा था, उस के संदर्भ में आपने अपनी प्रतिक्रिया जो प्रकाशनार्थ भेजी, उसकी एक प्रति आपने मुझे भेजी वह मैंने पढी। मैं इस अनुग्रह के लिये आपका हृदय से आभारी हूँ। छत्तीसगढ के किस अखबार में मेरा लेख प्रकाशित हुआ यह मैं नहीं जानता। मैंने दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले पाञ्चजन्यसाप्ताहिक के अतिरिक्त किसी भी अन्य समाचारपत्र को वह लेख नहीं भेजा था। पाञ्चजन्यने उसे प्रकाशित नहीं किया यह बात अलग है। संभवत:, छत्तीसगढ के उस अखबार ने मेरे ब्लॉग से वह लेख उद्धृत किया होगा। आप भी मेरे अन्य लेख उस ब्लॉग से पढ सकते हैं। ब्लॉग है mgvaidya.blogspot.com छत्तीसगढ के उस अखबार में शीर्षक में अपने स्वयं का आस्थाशब्द जोड दिया है। सम्पादक का वह अधिकार है। मेरी उस पर कोई आपत्ति नहीं।

अब बात आपके लेख की। आपने अपने लेख में झारखण्ड के एक आदिवासी का जो उदाहरण दिया वह यहाँ गैरलागू है। उस आदिवासीव्यक्ति को ईसाई बनाया गया। यहाँ, साईबाबा जो जन्म से मुसलमान थे, उनको हिन्दू बनाया गया है। उनकी पूजा आरती करना, या हिन्दूओं की अन्य देवताओंके समान उनकी मूर्ति प्रतिष्ठित करना यह हिन्दूकरण है। उसका स्वागत करना चाहिये। अपने हिंदुस्थान के इतिहास में शक, हूण, कुशान, यवन (यानी ग्रीक) आक्रामक करके आये। उन्होंने यहाँ विजय पाकर यहीं रहना पसन्द किया। काल के ओघ में वे सारे हिन्दू समाज में विलीन हो गये। गुजरात के गिरनार पर्वत पर रुद्रदामन् राजा का जो शिलालेख मिला है, उस में रुद्रदामनने अपनी पूर्वपीठिका बतायी है। उनके पिता का नाम जयदामन् था और पितामह का नाम चेष्टन था। चेष्टन के पुत्रपौत्रों ने हिन्दू नाम स्वीकृत किये। इसी तरह से शक, हूण और कुशान भी विशाल हिन्दू धर्म में और समाज में विलीन हो गये। अत:, साईबाबा को हिन्दू बनाया गया है, इसका आनंद मानना चाहिये कि दु:ख? आप के महाराज जैसे पीठाधीशों और मठाधीशों ने इसी प्रकार अपने हिन्दू समाज से अलग हुये अपने बंधुओं को फिर से अपने समाज में लाने के लिये प्रयत्नशील होना आवश्यक है।

हमारी प्राचीन काल से चली आयी धर्मकी अवधारणा को सभी ने ध्यान में लेना चाहिये। उपासना यह धर्म का केवल एक अंग है, सम्पूर्ण धर्म नहीं। धर्मकी व्युत्पत्ति संस्कृत के धृधातु से है और धृका अर्थ जोडना, धारण करना है। महाभारत में लिखा है, धर्मो धारयति प्रजा:। धर्म वह है जो प्रजा का धारण यानी रक्षण, पोषण करता है। उसी में लिखा है कि धारणाद् धर्म इत्याहु: -अर्थ स्पष्ट है कि वह धारण करता है इस लिये उसे धर्म कहते हैं।

किस की धारणा करता है धर्म’? सम्पूर्ण विश्‍व की, ब्रह्माण्ड की भी कह सकते हैं। विश्‍व में चार प्रमुख अस्तित्व हैं। एक है मानवव्यक्ति। दूसरा है मानवसमष्टि। मानवव्यक्ति समष्टि का अंश है । किन्तु समष्टि उसके बाहर भी है। किन्तु विश्‍व मानवसमष्टि के साथ समाप्त नहीं होता। क्यौं कि यहाँ पशु-पक्षी हैं, पहाड-नदीयाँ हैं- वृक्ष और वन भी हैं। यानी चराचर सृष्टि है। मानवसमष्टि इस सृष्टि का अंश है। और चौथा और सबसे महत्त्व का अस्तित्व है चैतन्य। जिसको मैं परमेष्ठी कहता हूँ। यह सब में है और सब के बाहर भी है। व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि और परमेष्ठी इन चारों को जोडनेवाला जो सूत्र है इसका नाम धर्महैं। जो विधा, अपने को व्यापकता से जोडती है वह धर्मबन जाती है। अपनी भाषा के कुछ शब्द लीजिये। जैसे धर्मशाला, धर्मार्थ अस्पताल, धर्मकांटा, राजधर्म, पुत्रधर्म आदि। धर्मशालामें कौनसी उपासना होती है? फिर धर्मशालाक्यौं? कारण हम अपने लिये कितना भी बडा और सुंदर मकान बनाइये वह धर्मनहीं। जब औरों के निवास की व्यवस्था करते हैं, तब धर्मशालाखडी होती है। हम अपने लिये दवाईयों का कितना भी प्रबन्ध करें, वह धर्मनहीं है। जब अन्यों के स्वास्थ्य की चिन्ता और व्यवस्था होती है, तब धर्मार्थ अस्पतालबनता है। यह स्वयं को व्यापकता से जोडना है। राजधर्मक्या राजा की उपासना है जो प्रजा की नहीं? जिन कर्तव्यों से राजा अपने को प्रजा से जोडता है वह राजधर्म है। और पुत्र जिन कर्तव्यों से स्वयं को माता-पिता से जोडता है वह पुत्रधर्म होता है। यही समष्टि धर्म है।

सृष्टि के साथ भी जोडने की व्यवस्था है। आवश्यकता है सम्मान से और आदर से जोडना चाहिये। अत: सृष्टि को हम मातृस्वरूप में देखते है। नदी लोकमाता बनती है। गंगामैय्या होती है। भूमि, भूमाता या मातृभूमि बतनी है। गौ-गोमाता बनती है। अचल हिमालय देवतात्मा कहलाया जाता है। पशुओं को पवित्रता अर्पण करने हेतु, उनको किसी ना किसी देवतास्वरूप से जोड दिया गया है। बैल को शंकरजी के साथ, गौ को भगवान् कृष्ण के साथ, हंस को सरस्वती के साथ, साँप को भी शंकर जी के साथ, छोटे चूहे को भी गणेशजी के साथ। इसी प्रकार वनस्पतियों को भी। तुलसी भगवान् विष्णु के लिये। बिल्व शंकर जी के लिये। दूर्वा गणेश जी के लिये। औंदुबर दत्तात्रेय के लिये और वटवृक्ष सावित्री के साथ।

अन्तिम सीढी जो है वह परमेष्ठी के साथ जोडने की। यह उपासना का दायरा है। आपने पूछा कि एकं सत् का क्या अर्थ है। वह है परमात्मा या परमेष्ठी। वही सत् यानी अक्षय है। किन्तु उस की उपासना की अनेक विधायें हो सकती हैं। विप्रा बहुधा वदन्ति का मतलब है बुद्धिमान लोक अनेक विधाओं से उसका वर्णन कर सकते हैं। यानी नाम अनेक हो सकते हैं। और अलग अलग नाम होने  के लिये रूप भी अनेक होना आवश्यक है। इस लिये हम अपने उपासना के लिये किसी रूप का या नाम का स्वीकार कर सकते हैं। कुछ थोडे ऐसे भी हो सकते हैं कि जो निराकार, निर्गुण की भी उपासना कर  सकते हैं। उपासना को ही परमार्थसाधना कहते हैं।

किन्तु विश्‍व जैसा पारमार्थिक है वैसाही वह भौतिक भी है। धर्मदोनों की चिन्ता करता है और व्यवस्था निहित करता है। अत: धर्मकी वैशेषिकों ने जो परिभाषा की है वह भी ध्यान में लेनी चाहिये। वह यह यतोऽभ्युदयनि:श्रेयससिद्धि: स धर्म: यानी जिस से अभ्युदययानी ऐहिक उन्नति और नि:श्रेयसयानी पारमार्थिक कल्याण की सिद्धि होती है, वह धर्महै। हिन्दू धर्म इस अर्थ में एकमात्र धर्महै। बाकी सब मजहब, सम्प्रदाय, पंथ एवं आस्थाएँ हैं। इस सबको हिन्दू धर्म में स्थान है। इस लिये डॉ. राधाकृष्णन् ने जो कहा कि 'Hinduism is not a religion; it is a common-wealth of many religions' वह एकदम सही है।

हिन्दू धर्म की इस विशाल व्यापकता के कारण ही वेदों की निन्दा करनेवाले गौतम बुद्ध को भी भगवान् का अवतार माना गया है। कवि जयदेव का यह वचन-
निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातम्
सदयहृदय दर्शितपशुघातम्
केशव धृतबुद्धशरीर । जय जगदीश हरे।
इसका चाहे उतना विस्तार किया जा सकता है। अत: यही विश्राम लेना चाहता हूँ।

हां, और एक बात रही। वह यह आपके गुरू स्वामी स्वरूपानंद महाराज की। आप ही अपने मन में सोचे कि अन्य पीठों के भी शंकराचार्य है। वे विवाद का विषय क्यौं नहीं बनते और स्वरूपानंद जी महाराज ही क्यौं? मैंने इस विषय का अधिक विस्तार करने की आवश्यकता नहीं। समझनेवाले समझ सकते हैं।

अस्तु। शेष शुभ।

स्नेहांकित
मा. गो. वैद्य